जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं अब वो बनाएंगे दूसरों के आशियाने
सुकमा, 08 मई 2026/sns/- कभी घोर नक्सल प्रभावित रहे सुकमा जिले में शांति और विकास की एक नई इबारत लिखी जा रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में आत्मसमर्पित नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शासन ने एक ऐसी संवेदनशील और दूरदर्शी पहल की है, जो पूरे देश के लिए मिसाल बन गई है। एक समय जिन हाथों में विनाश की बंदूकें थीं, आज जिला प्रशासन और एसबीआई आरसेटी (ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान) के संयुक्त प्रयासों से उन्हीं हाथों में निर्माण के औजार और सुनहरे भविष्य के सपने हैं। पुनर्वास केंद्र में रह रहे 25 आत्मसमर्पित नक्सलियों (जिसमें 13 महिलाएं और 12 पुरुष शामिल हैं) को राजमिस्त्री का व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भरता की ओर एक मजबूत कदम बढ़ाया गया है।
प्रशासन का “मास्टरस्ट्रोक“, कौशल विकास से 25 पुनर्वासित युवाओं को मिलेगा रोजगार
प्रशासन का यह अभियान केवल कौशल विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुर्गम, पहुँचविहीन और विकास से दूर रहे क्षेत्रों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने का एक अचूक मास्टरस्ट्रोक भी है। लंबे समय से इन अंदरूनी इलाकों में कुशल राजमिस्त्रियों की कमी के कारण विकास कार्य थमे हुए थे। अब ये प्रशिक्षित युवा प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण और अन्य भवन निर्माण के तहत जिले के अधूरे और नए आवासों को अपने हाथों से तराशेंगे। इस तरह प्रशासन ने एक ही प्रयास से न सिर्फ इन युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देकर उनका आर्थिक व सामाजिक समावेशन सुनिश्चित किया है, बल्कि सुकमा के विकास कार्यों को भी एक नई रफ्तार और गुणवत्ता दी है।
बंदूक छोड़ी, अब आत्मसम्मान से संवारेंगी जिंदगीरू सोड़ी हूंगी की कहानी
अरलमपल्ली, कोंटा निवासी हूंगी सोड़ी की आंखों में अब डर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई चमक है। हिंसा का रास्ता छोड़ जिंदगी की नई शुरुआत करने वाली हूंगी ने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय को दिल से धन्यवाद देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने हमारे रहने, खाने और सम्मान से जीने का पूरा इंतजाम किया है। यहाँ राजमिस्त्री का काम सीखकर हम न सिर्फ अपने पैरों पर खड़े होंगे, बल्कि मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का सहारा भी बनेंगे।
कलेक्टर श्री अमित कुमार ने बताया कि आत्मसमर्पण का वास्तविक अर्थ सिर्फ हथियार छोड़ना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनकर समाज की मुख्यधारा में शामिल होना है। अब तक लगभग 280 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। पुनर्वासित युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर स्थायी व सम्मानजनक जीवन देना जिला प्रशासन की सर्वाेच्च प्राथमिकता है। यह पहल सुकमा में शांति, विश्वास और विकास की मजबूत नींव रख रही है।
जंगलों की दुश्वारियों से निकलकर आत्मनिर्भरता की ओर पदम रैनू
जगरगुंडा के मंडीमरका निवासी पदम रैनू की कहानी बस्तर में आ रहे बदलाव की एक जीती-जागती तस्वीर है, जिन्होंने अतीत के अंधेरे को पीछे छोड़ खुशहाल भविष्य की ओर कदम बढ़ाया है। छत्तीसगढ़ सरकार की इस संवेदनशील पुनर्वास नीति की तारीफ करते हुए पदम भावुक होकर कहते हैं, पहले हमारा जीवन जंगलों में बेहद कठिनाई और अनिश्चितता में बीतता था, जहाँ रहने-खाने का कोई ठिकाना नहीं था; लेकिन आज सरकार की बदौलत हमें यहाँ बेहतरीन आवासीय सुविधाएं और राजमिस्त्री बनने का प्रशिक्षण मिल रहा है। इससे हम आत्मनिर्भर बनेंगे, अपने और अपने परिवार का पालन पोषण करेंगे। छत्तीसगढ़ सरकार हमारे पुनर्वास के लिए बहुत अच्छा काम कर रही है। इसके लिए सरकार को बहुत बहुत धन्यवाद।
जिला प्रशासन का यह अनुकरणीय प्रयास यह साबित करता है कि अगर प्रशासन संवेदनशील हो, तो बंदूक की गोली पर विकास और विश्वास की बोली भारी पड़ती है, जिससे बस्तर की वादियों में स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। जिला प्रशासन के इस आत्मीय प्रयास ने न केवल पदम, सोड़ी हूंगी जैसे युवाओं को जंगलों के खौफ से आजादी दिलाई है, बल्कि उनके हाथों में हुनर सौंपकर समाज में सम्मान से जीने और अपने परिवार का बेहतर पालन-पोषण करने का एक अटूट भरोसा भी दिया है।