धान की फसल पर झुलसा रोग का खतरा, वैज्ञानिकों ने किसानों को किया सतर्क
सुकमा, 07 अक्टुबर 2026/sns/- जिले में वर्तमान खरीफ मौसम के दौरान धान की फसल में जीवाणु जनित झुलसा रोग (बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट) के लक्षण सामने आने लगे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख तथा पौध रोग वैज्ञानिक श्री राजेन्द्र प्रसाद कश्यप और कीट वैज्ञानिक डॉ. योगेश कुमार सिदार ने किसानों को रोग की पहचान और प्रभावी प्रबंधन को लेकर आवश्यक सलाह जारी की है। वैज्ञानिकों ने मुरतोण्डा, बोरगुड़ा, चीकपाल, पाकेला, पुजारीपाल, सुरेपाल, रामाराम एवं पोरदेम क्षेत्रों का नैदानिक भ्रमण कर तथा किसानों से प्राप्त जानकारी के आधार पर फसल की स्थिति का आकलन किया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, झुलसा रोग के शुरुआती लक्षण रोपाई या बुवाई के करीब 20 से 25 दिन बाद दिखाई दे सकते हैं और यह रोग फसल की छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक प्रभावित कर सकता है। शुरुआत में पत्तियों के किनारों और ऊपरी सिरे पर पीलापन दिखाई देता है। इसके बाद पत्तियां नोक और किनारों से सूखने लगती हैं तथा संक्रमित हिस्से झुलसे हुए नजर आते हैं। कई मामलों में पत्तियों पर राख के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं। रोग का प्रकोप बढ़ने पर पत्तियां पूरी तरह सूख सकती हैं, जिससे पौधों की वृद्धि, कल्लों की संख्या और दानों के भराव पर प्रतिकूल असर पड़ने के साथ उपज में कमी की आशंका रहती है।
किसानों को वैज्ञानिकों ने प्रबंधन के उपाय भी बताए हैं। खेतों को खरपतवार मुक्त रखने और पुराने फसल अवशेषों को नष्ट करने के साथ संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का उपयोग करने की सलाह दी गई है। अनावश्यक नत्रजन के प्रयोग से बचने को कहा गया है। रोग के लक्षण दिखाई देने पर, यदि खेत में पानी उपलब्ध हो तो अतिरिक्त पानी निकालकर खेत को 3 से 4 दिन तक खुला रखने तथा 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने की सलाह दी गई है। प्रारंभिक लक्षण दिखने पर 2 किलोग्राम ताजा गोबर को 100 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर फसल पर छिड़काव करने की भी सलाह दी गई है।
रासायनिक उपचार की फिलहाल अनुशंसा नहीं। कृषि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान स्थिति में किसी भी रासायनिक उपचार की अनुशंसा नहीं की गई है। किसानों से धान की फसल की नियमित निगरानी करने और शुरुआती लक्षण नजर आते ही आवश्यक प्रबंधन उपाय अपनाने की अपील की गई है। रोग की सही पहचान और आगे के प्रबंधन के लिए किसान कृषि विज्ञान केंद्र अथवा कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं, ताकि समय रहते फसल को संभावित नुकसान से बचाया जा सके।