वंदेमातरम् की धुन पर थिरकी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पारंपरिक नृत्यों ने बांधा समां

वंदेमातरम् की धुन पर थिरकी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पारंपरिक नृत्यों ने बांधा समां

वंदेमातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर राष्ट्रभावना और छत्तीसगढ़ी लोक परंपराओं का हुआ अद्भुत संगम, रिखीराम क्षत्रीय एवं उनकी टीम की प्रस्तुति ने मोहा दर्शकों का मन

करमा, सुआ, राउत नाचा, पंथी, सैला, गौर, माड़िया और बारहमासी नृत्यों ने बिखेरे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता के रंग

रायपुर, 16 अगस्त 2026/ स्वतंत्रता दिवस की संध्याकालीन बेला में राजधानी रायपुर के मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में देशभक्ति, राष्ट्रभावना और छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय संस्कृति का ऐसा मनोहारी संगम देखने को मिला, जिसने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम‘ की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने तथा ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के अंतर्गत संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा विशेष संध्याकालीन सांस्कृतिक आयोजन किया गया। नाटक, नृत्य, संगीत, प्रकाश एवं ध्वनि के प्रभावशाली संयोजन से सजी इस प्रस्तुति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की परिस्थितियों से लेकर स्वतंत्र भारत के छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता तक की यात्रा को बेहद आकर्षक ढंग से मंच पर जीवंत किया गया।

      कार्यक्रम में भिलाई के प्रसिद्ध लोक कलाकार श्री रिखीराम क्षत्रीय एवं उनकी टीम ने ‘वंदेमातरम‘ की भावपूर्ण प्रस्तुति के साथ छत्तीसगढ़ के पारंपरिक एवं जनजातीय लोकनृत्यों की ऐसी श्रृंखला प्रस्तुत की, जिसमें प्रदेश की विविध लोक संस्कृतियों के रंग एक साथ दिखाई दिए। कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से यह संदेश दिया कि राष्ट्रभावना और राष्ट्रीय एकता की चेतना भारत की विविध लोक परंपराओं में भी गहराई से रची-बसी है।

वंदेमातरम् के साथ छत्तीसगढ़ के लोकनृत्यों का अनूठा संगम

       प्रस्तुति में सैला, करमा, गौर, माड़िया, राउत नाचा, सुआ और बारहमासी सहित विभिन्न पारंपरिक एवं जनजातीय नृत्यों को वंदेमातरम् की भावधारा के साथ जोड़ा गया। लोकनृत्यों की जीवंत लय, पारंपरिक वेशभूषा, लोकवाद्यों की मधुर ध्वनि और कलाकारों के उत्साहपूर्ण प्रदर्शन ने पूरे मुक्ताकाशी मंच को देशभक्ति और सांस्कृतिक उल्लास से भर दिया।

      वंदेमातरम् को केवल एक राष्ट्रगीत के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसे छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की विविध अभिव्यक्तियों को जोड़ने वाली भावधारा बनाया गया। अलग-अलग अंचलों के लोकनृत्यों को एक सूत्र में पिरोकर कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एकता और विविधता को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।

नृत्य नाटिका में दिखी अंग्रेजी शासनकाल से स्वतंत्र भारत तक की यात्रा

      रिखीराम क्षत्रीय एवं उनकी टीम ने नृत्य नाटिका के माध्यम से अंग्रेजी शासनकाल की परिस्थितियों, उस दौर की सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की भावना को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। इसके बाद स्वतंत्र भारत में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक यात्रा और यहां की लोक एवं जनजातीय परंपराओं को मंच पर जीवंत किया । नाटक, अभिनय, नृत्य और संगीत के माध्यम से इतिहास तथा संस्कृति को एक साथ प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्तुति ने दर्शकों को यह अनुभव कराया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ने का संकल्प भी है।

प्रकाश और ध्वनि के प्रभावशाली संयोजन ने बढ़ाया रोमांच

      कार्यक्रम की एक विशेष खूबी प्रकाश एवं ध्वनि का प्रभावशाली संयोजन रहा। मंच पर बदलती रोशनी, ध्वनि प्रभाव, संगीत, नृत्य और अभिनय के मेल ने प्रत्येक दृश्य को जीवंत बना दिया। प्रकाश और ध्वनि के इस सुंदर समन्वय ने प्रस्तुति के भावों को और अधिक प्रभावशाली बनाया तथा दर्शकों को पूरे कार्यक्रम से बांधे रखा।

      राष्ट्रभक्ति के ओजस्वी भाव और छत्तीसगढ़ की लोकधुनों की ऊर्जा से सजी इस प्रस्तुति के दौरान मुक्ताकाशी मंच का वातावरण देशभक्ति के रंग में रंगा नजर आया। दर्शकों ने कलाकारों की शानदार प्रस्तुति का तालियों की गड़गड़ाहट से उत्साहवर्धन किया।

दर्शक बोले छत्तीसगढ़ की संस्कृति को वंदेमातरम् के साथ देखना भावपूर्ण अनुभव

      कार्यक्रम देखने पहुंचे दर्शकों ने प्रस्तुति की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोक एवं जनजातीय  संस्कृति को वंदेमातरम् की राष्ट्रभावना के साथ इस तरह एकाकार होते देखना बेहद भावुक और गौरवपूर्ण अनुभव रहा।

      दर्शकों के अनुसार नाटक, संगीत, लोकनृत्य, प्रकाश और ध्वनि का संयोजन इतना प्रभावशाली था कि कार्यक्रम कब समाप्त हो गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। कई दर्शकों ने आने वाले समय में इस तरह के कार्यक्रमों की अवधि बढ़ाने की इच्छा भी व्यक्त की, ताकि वे छत्तीसगढ़ की और अधिक लोक परंपराओं तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद ले सकें।

संचालक श्री संजय कन्नौजे ने बताई आयोजन की महत्ता

       कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्कृति, पुरातत्व एवं राजभाषा संचालक श्री संजय कन्नौजे ने वंदेमातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और उद्देश्य की जानकारी दी। उन्होंने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाने के साथ समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं।

      श्री कन्नौजे ने कहा कि वंदेमातरम् केवल एक राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना का प्रतीक है। इसके 150 वर्ष पूर्ण होना देश के लिए गौरव और स्मरण का महत्वपूर्ण अवसर है। संस्कृति विभाग ने इस अवसर को छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय परंपराओं के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, ताकि नई पीढ़ी स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी करीब से समझ सके।

     उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी विविध लोककलाओं, जनजातीय परंपराओं, लोकनृत्यों और सांस्कृतिक विरासत से है। करमा, सुआ, राउत नाचा, पंथी, सैला, गौर, माड़िया और अन्य लोकनृत्य हमारी सांस्कृतिक अस्मिता के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। इन्हें वंदेमातरम् की राष्ट्रभावना के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना इस आयोजन की विशेष उपलब्धि रही।

     श्री कन्नौजे ने कहा कि संस्कृति और राष्ट्रभावना को साथ लेकर चलने वाले ऐसे आयोजन समाज में अपनी जड़ों और विरासत के प्रति गौरव की भावना को मजबूत करते हैं। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रध्वज के माध्यम से देश के प्रति सम्मान और गौरव से जोड़ने का संदेश देता है। इसी भावना के साथ संस्कृति विभाग ने इस विशेष सांस्कृतिक आयोजन को तैयार किया।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का प्रेरक प्रयास

     स्वतंत्रता दिवस की संध्या पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि इतिहास, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ समझने और महसूस करने का अवसर भी बना। छत्तीसगढ़ की लोक एवं जनजातीय परंपराओं को वंदेमातरम् के साथ जोड़कर प्रस्तुत किए जाने से कार्यक्रम ने नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और उन पर गर्व करने का प्रेरक संदेश दिया।

      वंदेमातरम् की 150 वर्ष की गौरवपूर्ण यात्रा और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के विविध रंगों के इस संगम ने स्वतंत्रता दिवस की संध्या को यादगार बना दिया। राष्ट्रभावना, लोककला और सांस्कृतिक विरासत के इस अनूठे मिलन ने यह संदेश दिया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है और यही विविधता राष्ट्र की एकता को और अधिक मजबूत बनाती है।

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