दुर्गम राहें, रात के कैंप और राष्ट्रीय मानक का तमगा
सुकमा, 20 मई 2026/sns/- कभी घने जंगलों, पहुंचविहीन रास्तों और नक्सलवाद के खौफ के साए में सिमटा सुकमा जिले का मिनपा क्षेत्र आज बदलाव की एक नई कहानी गढ़ रहा है। यह कहानी एक झोपड़ी से शुरू हुई थी, जिसे विपरीत हालातों में अस्पताल का रूप देकर स्वास्थ्य सेवाएं शुरू की गई थीं। उस दौर में जब बुनियादी सुविधाएं भी एक सपना हुआ करती थीं, तब स्वास्थ्य विभाग के जांबाज कर्मचारियों ने सुदूर अंदरूनी इलाकों के ग्रामीणों से संपर्क साधा। निरंतर मेहनत और अथक प्रयासों से स्वास्थ्य कैंपों का आयोजन कर न सिर्फ लोगों का इलाज किया गया, बल्कि उनके भीतर स्वास्थ्य के प्रति एक नई जागरूकता की अलख भी जगाई गई।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के संवेदनशील नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति का नतीजा है कि साल 2024 में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। मिनपा में एक भव्य और नवीन उप स्वास्थ्य केंद्र भवन बनकर तैयार हुआ, जिसने पुरानी झोपड़ी की जगह ले ली। प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए इस नए भवन में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, अत्याधुनिक प्रयोगशाला कक्ष और समर्पित स्टाफ की व्यवस्था को दुरुस्त किया। आज यह केंद्र मिनपा सहित दुलेड़, एलमागुंडा, भटपाड़, पोट्टेमडगू, टोंडामरका और गुंडराजपाड़ जैसे दुर्गम गांवों की लगभग 3,593 ग्रामीणों की आबादी के लिए एक जीवनदायिनी उम्मीद बन चुका है। इस व्यवस्था की सबसे खूबसूरत और मानवीय झलक तब दिखती है, जब स्वास्थ्य कर्मी खुद चलकर ग्रामीणों के पास पहुंचते हैं। पोट्टेमडगू, दुलेड़, गुंडराजपाड़ और भाटपाड़ जैसे पूरी तरह कटे हुए गांवों में जाने के लिए स्टाफ को बेहद कठिन रास्तों का सामना करना पड़ता है। कई बार जब एक ही दिन में लौट पाना मुमकिन नहीं होता, तो ये कर्मवीर हार नहीं मानते। वे वहीं रुककर “नाईट कैंप“ लगाते हैं और रात के सन्नाटे में भी मरीजों की जांच और उपचार करते हैं। इसी सेवाभाव का परिणाम है कि आज इस स्वास्थ्य केंद्र में हर दिन 15 से 20 मरीजों की ओपीडी हो रही है और हर महीने करीब 4 सुरक्षित प्रसव कराए जा रहे हैं, जो संस्थागत प्रसव के प्रति ग्रामीणों के बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।
इस जमीनी संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर तब सबसे बड़ा सम्मान मिला, जब 15 मई को इस केंद्र ने “राष्ट्रीय गुणवत्ता मानक स्तर“ (NQAS) का कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न किया। मितानिन, एएनएम, सीएचओ, सुपरवाइजर और सेक्टर मेडिकल ऑफिसर की दिन-रात की कड़ी मेहनत और जिला प्रशासन के मजबूत सहयोग से यह असंभव सा दिखने वाला सफर पूरा हुआ। एक टूटी झोपड़ी की विषम परिस्थितियों से निकलकर राष्ट्रीय गुणवत्ता के मापदंडों को छूने की यह दास्तान बयां करती है कि अगर प्रशासन का संकल्प और जनता का साथ हो, तो बंदूक की धमक पर विकास की धमक हमेशा भारी पड़ती है।