कृषि विभाग ने धान में राईस पैनिकल माईट का प्रकोप के लक्षण, फैलाव एवं एकीकृत प्रबंधन हेतु जारी की एडवायजरी
दुर्ग, 05 अक्टूबर 2026/sns/- संयुक्त संचालक कृषि संभाग-दुर्ग द्वारा धान की फसल में राईस पैनिकल माईट (धान की मकड़ी) से होने वाली क्षति के लक्षणों एवं इसके समुचित प्रबंधन हेतु एडवायजरी जारी की गई है। कृषि विज्ञान केन्द्र पाहंदा (अ), दुर्ग के विशेषज्ञों के अनुसार यह अत्यंत सूक्ष्म कीट (स्टेनेओटारसोनेमस स्पिंकी स्माइली) धान के गभोट (बूटिंग) अवस्था से लेकर बालियों में दूध भरने के दौरान फसल पर हमला करता है, जिससे दाने बदरंग (कत्थई, लाल या काले) एवं खाली (बदरा) रह जाते हैं तथा उत्पादन में 5 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक का भारी नुकसान हो सकता है। पत्तियों पर सफेद-भूरी धारियां बनना, बालियों में फफूंद व जीवाणु जनित संक्रमण से धब्बे पड़ना तथा चावल बनने की प्रक्रिया का रुकना इसके प्रमुख पहचान चिन्ह हैं। इस कीट की मादा एक बार में 50 से 80 अंडे देती है, जिससे 2 से 4 दिन में निकले निंफ (शिशु) बालियों व दानों का रस चूसकर 3 से 7 दिनों में सर्वाधिक क्षति पहुँचाते हैं और मात्र 10 से 12 दिनों में नई पीढ़ी तैयार हो जाती है। 25°C से 35°C तापमान, 80 से 90 प्रतिशत की नमी, उमस भरा मौसम तथा नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक प्रयोग इसके तीव्र फैलाव के मुख्य कारण हैं। यह कीट फसल अवशेषों (नरई), मेड़ों के खरपतवारों, जंगली लाल धान, संक्रमित बीज, तेज हवा, सिंचाई जल, कृषि यंत्रों, मजदूरों के कपड़ों एवं अन्य मित्र कीटों के माध्यम से एक खेत से दूसरे खेत में तेजी से प्रसारित होता है।
कीट के प्रभावी नियंत्रण के लिए कृषि विभाग ने किसानों को एकीकृत प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। इसके अंतर्गत खेतों एवं मेड़ों की सफाई रखने, कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई कर अवशेष नष्ट करने, धान के बाद दलहनी-तिलहनी फसलों का फसल चक्र अपनाने और प्राकृतिक रूप से कीटों को खाने वाली शिकारी (मित्र) मकड़ियों का संरक्षण करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही यूरिया का असंतुलित प्रयोग न करते हुए पोटाश व सल्फर की संतुलित मात्रा देने की सलाह दी गई है। रासायनिक नियंत्रण हेतु गभोट एवं बालियां निकलने की शुरुआती अवस्था में स्पाइरोमेसिफेन 22.9 प्रतिशत एससी (150 मिली) तथा प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी (150 मिली) प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की अनुशंसा की गई है।