बेरोजगारी से आत्मनिर्भरता तक  योजना ने बदली राघवेंद्र चापड़ी की जिंदगीराइस मिल और टोरा मिल स्थापित कर बने सफल उद्यमी किसानों को भी मिल रहा बेहतर लाभ

बीजापुर, 12 जून 2026/sns/- दृढ़ संकल्प, अथक परिश्रम और सही मार्गदर्शन के साथ यदि सरकारी योजनाओं का सहयोग मिल जाए तो जीवन की दिशा बदल सकती है। इसका जीवंत उदाहरण हैं ग्राम मुरदण्डा, विकासखंड उसुर, जिला बीजापुर निवासी राघवेंद्र चापड़ी, जिन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना ( PMFME ) का लाभ लेकर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की, बल्कि क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों के लिए भी रोजगार एवं आय के नए अवसर पैदा किए।
राघवेंद्र बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब वे पूरी तरह बेरोजगार थे। परिवार की बढ़ती जिम्मेदारियों और आय के स्थायी स्रोत के अभाव में उनका जीवन संघर्षों से घिरा हुआ था। घर की आवश्यक जरूरतों को पूरा करना भी कठिन हो गया था। भविष्य को लेकर अनिश्चितता और आर्थिक परेशानियों के बीच वे लगातार किसी अवसर की तलाश में थे, लेकिन सही मार्गदर्शन और आर्थिक सहयोग के अभाव में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।
इसी दौरान उन्होंने जिला उद्योग केंद्र, बीजापुर से संपर्क किया। यहां अधिकारियों एवं डीआरपी द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना ( PMFME ) की जानकारी दी गई। योजना के बारे में विस्तार से समझाने के साथ उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया गया। इस मार्गदर्शन ने उनके भीतर नया आत्मविश्वास जगाया और आत्मनिर्भर बनने की उम्मीद को नई उड़ान दी।
डीआरपी के सहयोग से राघवेंद्र ने PMFME योजना के तहत सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बीजापुर में ऋण के लिए आवेदन किया। आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद उन्हें 13 लाख 1 हजार 400 रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ। यह सहायता उनके जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तनकारी अवसर साबित हुई।
ऋण प्राप्त होने के बाद उन्होंने अपने गांव में राइस मिल एवं टोरा मिल की स्थापना की। पहले क्षेत्र के किसान सुगंधित धान को बिना प्रसंस्करण के कम कीमत पर बेचने को मजबूर थे। स्वयं राघवेंद्र भी अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त नहीं कर पाते थे। लेकिन राइस मिल शुरू होने के बाद उन्होंने सुगंधित धान की प्रोसेसिंग कर उसे बाजार में बेहतर मूल्य पर बेचना शुरू किया। आज वे प्रसंस्कृत सुगंधित चावल को लगभग 100 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेच रहे हैं, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसी प्रकार टोरा (वनोपज) को पहले 8 से 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचना पड़ता था। अब टोरा की प्रोसेसिंग कर उससे तेल निकालकर लगभग 100 रुपये प्रति लीटर की दर से विक्रय किया जा रहा है। टोरा तेल की मांग विशेष रूप से मंदिरों में दीप प्रज्ज्वलन तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान अधिक रहती है। इसके अलावा तेल निष्कर्षण के बाद बचने वाली टोरा खली को 12 से 15 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचकर अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा रही है।
राघवेंद्र कहते हैं कि सफलता का यह सफर आसान नहीं था। शुरुआती दौर में मशीन संचालन, बाजार की तलाश और ग्राहकों का विश्वास जीतने जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और लगातार मेहनत करते रहे। परिणामस्वरूप आज उनकी आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत हो चुकी है।
आज राघवेंद्र न केवल अपने परिवार का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर किसानों एवं ग्रामीणों को बेहतर सुविधाएं भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनके उद्योग से किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य मिल रहा है तथा ग्रामीणों को प्रसंस्करण की सुविधा अपने ही क्षेत्र में उपलब्ध हो रही है।
राघवेंद्र अपनी इस सफलता का श्रेय उद्योग विभाग, जिला उद्योग केंद्र बीजापुर तथा  PMFME  योजना को देते हैं। वे कहते हैं कि विभागीय अधिकारियों के मार्गदर्शन और सहयोग के बिना यह उपलब्धि संभव नहीं थी। उन्हें विश्वास है कि भविष्य में भी इसी प्रकार का सहयोग मिलता रहेगा, जिससे वे अपने उद्यम का विस्तार कर जिले और राज्य के आर्थिक विकास में और अधिक योगदान दे सकेंगे। राघवेंद्र चापड़ी की कहानी यह साबित करती है कि सही दिशा, सरकारी योजनाओं का लाभ और दृढ़ इच्छाशक्ति किसी भी व्यक्ति को संघर्षों से निकालकर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।

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