धान की फसल पर ‘सोरटी’ का प्रकोप, किसानों को समय रहते फसल बचाने की सलाह
सुकमा, 30 सितम्बर 2026/sns/- जिले में धान की फसल पर पत्ती मोड़क कीट यानी स्थानीय भाषा में ‘सोरटी’ का प्रकोप सामने आया है। कृषि विज्ञान केंद्र, सुकमा के वैज्ञानिकों के अनुसार मुरतोण्डा, पाईकरामपुरम, रामाराम, नीलावरम, सुरेपाल, सोनाकुकानार, धोबनपाल, पुजारीपाल एवं रामपुरम गांवों में इस कीट की मौजूदगी देखी गई है। कीट की इल्ली पत्तियों को मोड़कर उनके भीतर छिप जाती है और पत्तियों के हरे भाग को खुरचकर खाती है। इससे पत्तियों पर सफेद या पारदर्शी धारियां दिखाई देती हैं, प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है और अधिक प्रकोप की स्थिति में पौधों की वृद्धि एवं धान की उपज पर असर पड़ सकता है।
फसल में शुरुआती लक्षण दिखते ही किसान सतर्क होकर नियंत्रण के उपाय अपनाएं। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख तथा पौध रोग वैज्ञानिक श्री राजेन्द्र प्रसाद कश्यप, कीट वैज्ञानिक डॉ. योगेश कुमार सिदार एवं उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. गूंजेश्री गोंड ने किसानों को खेत एवं मेड़ों को खरपतवार मुक्त रखने, संतुलित उर्वरक का प्रयोग करने तथा अनावश्यक नाइट्रोजन से बचने की सलाह दी है। खेतों में पक्षी मीनार और प्रकाश प्रपंच लगाने, प्रभावित पत्तियों एवं इल्ली को नष्ट करने तथा ट्राइकोग्रामा चिलोनीस जैसे जैव-नियंत्रण उपाय अपनाने के साथ-साथ मकड़ी, ड्रैगनफ्लाई, परभक्षी ततैया एवं कीटभक्षी पक्षियों जैसे मित्र जीवों के संरक्षण पर भी जोर दिया गया है।
वैज्ञानिकों ने किसानों से धान की फसल की नियमित निगरानी कर समय पर समेकित प्रबंधन अपनाने की अपील की है। प्रारंभिक प्रकोप में नीम आधारित जैविक उपाय स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अपनाए जा सकते हैं, जबकि अधिक प्रकोप और आर्थिक क्षति स्तर पार होने पर कृषि विभाग या कृषि वैज्ञानिक की अनुशंसा के अनुसार ही पंजीकृत कीटनाशक का उपयोग करें। बारिश के मौसम को देखते हुए कीटनाशक का छिड़काव बारिश रुकने और मौसम साफ होने पर ही किया जाए। वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती स्तर पर पहचान और उचित प्रबंधन से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।