नैनो उर्वरक के उपयोग से बढ़ी पैदावार मिट्टी संरक्षण में भी मिल रहा लाभरू किसान सत्यनारायण
अम्बिकापुर, 13 जून 2026/sns/- कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों और नवाचारों को अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता को भी संरक्षित कर रहे हैं। जिले के ग्राम भगवानपुर निवासी प्रगतिशील किसान श्री सत्यनारायण ने नैनो यूरिया के उपयोग से प्राप्त सकारात्मक अनुभव साझा करते हुए बताया कि नैनो उर्वरक खेती को अधिक लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
करीब तीन एकड़ कृषि भूमि पर खेती करने वाले श्री सत्यनारायण पिछले दो वर्षों से अपनी फसलों में नैनो यूरिया-डीएपी का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में नैनो यूरिया-डीएपी का छिड़काव अधिक प्रभावी साबित हो रहा है। नैनो उर्वरक का उपयोग फसलों पर पर्णीय छिड़काव (फोलियर स्प्रे) के रूप में किया जाता है, जिससे पोषक तत्व सीधे पौधों तक पहुंचते हैं और उनका अधिकतम उपयोग हो पाता है।
श्री सत्यनारायण ने बताया कि सामान्य उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जबकि नैनो उर्वरक के छिड़काव से पोषक तत्व सीधे पौधों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। इससे उर्वरक का अनावश्यक रिसाव मिट्टी में नहीं होता और भूमि की गुणवत्ता सुरक्षित बनी रहती है। उन्होंने कहा कि नैनो यूरिया के उपयोग से फसलों की वृद्धि बेहतर हुई है तथा उत्पादन में भी सकारात्मक वृद्धि देखने को मिली है।
उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों के अनुभव के आधार पर वे नैनो यूरिया को किसानों के लिए उपयोगी एवं लाभकारी विकल्प मानते हैं। इससे न केवल खेती की लागत कम करने में सहायता मिलती है, बल्कि मिट्टी के दीर्घकालीन संरक्षण में भी मदद मिलती है। बेहतर उत्पादन के साथ भूमि की उर्वरता बनाए रखना भविष्य की खेती के लिए अत्यंत आवश्यक है।
किसान श्री सत्यनारायण ने जिले के अन्य किसानों से भी नैनो यूरिया-डीएपी अपनाने की अपील करते हुए कहा कि वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर आधुनिक तकनीकों का लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नैनो उर्वरकों का उपयोग कर किसान अपनी भूमि को सुरक्षित रखते हुए बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कृषि भूमि की गुणवत्ता बनी रहेगी।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नैनो उर्वरकों का संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग फसल उत्पादन बढ़ाने, लागत कम करने तथा पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। किसानों को समय-समय पर इसके उपयोग संबंधी प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया जा रहा है।