जलभराव वाले खेतों के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने दी श्लेही पद्धतिश् अपनाने की सलाह
सुकमा, 08 जूलाई 2026/sns/-कृषि विज्ञान केंद्र, सुकमा द्वारा जिले के किसानों के लिए मौसम आधारित विशेष कृषि सलाह जारी की गई है। आगामी दिनों में आसमान में बादल छाए रहने और हल्की से मध्यम वर्षा की संभावना को देखते हुए वैज्ञानिकों ने किसानों को वैज्ञानिक अनुशंसाओं और प्राकृतिक खेती की तकनीकों के अनुसार खरीफ फसलों की बुवाई करने की सलाह दी है। उन्नत किस्मों के प्रमाणित बीजों के चयन, समय पर बुवाई और उचित बीजोपचार से किसान कम लागत में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए धान (एमटीयू-1010, छत्तीसगढ़ धान-1919), रागी (छत्तीसगढ़ रागी-2) और अरहर (राजीवलोचन) जैसी प्रमुख फसलों की अनुशंसित किस्में अपनाने पर विशेष बल दिया गया है।
धान की खेती के लिए वैज्ञानिकों ने समतल खेतों में सीड ड्रिल के माध्यम से 20 सेंटीमीटर की कतार दूरी पर बुवाई करने की सलाह दी है। यदि लगातार वर्षा के कारण खेतों में पानी भर जाए और कतार बुवाई संभव न हो, तो किसानों को “लेही पद्धति“ अपनाने का सुझाव दिया गया है। इस पद्धति में हल्के जलभराव वाले खेतों में अंकुरित या उपचारित बीजों का समान छिड़काव किया जाता है, जिससे समय पर बुवाई सुनिश्चित होती है और उत्पादन का नुकसान नहीं होता। बुवाई से पहले बीजों को नमक घोल, बीजामृत या पीएसबी कल्चर से उपचारित करने तथा मौसम साफ होने पर ही कृषि रसायनों का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
खेती की लागत घटाने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्राकृतिक खेती की तकनीकों जैसे बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, मल्चिंग और वाफसा को अपनाने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही, उद्यानिकी फसलों के अंतर्गत वर्षाकालीन सब्जियों (भिंडी, बैंगन, मिर्च आदि) की तैयारी, करेला-बरबट्टी के लिए मेड़-नाली पद्धति और अदरक-हल्दी में जल निकास की समुचित व्यवस्था करने को कहा गया है। फलदार पौधों जैसे पपीता, केला, आम और अमरूद में भी आवश्यकतानुसार कटाई-छंटाई, सिंचाई और रोग प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई है।
पशुपालन और मुर्गीपालन के क्षेत्र में भी मौसम को देखते हुए एहतियात बरतने के निर्देश दिए गए हैं। किसानों को अपने पशुओं को गलघोटू और लंगड़ा बुखार जैसे रोगों से बचाने के लिए समय पर टीकाकरण कराने तथा उन्हें स्वच्छ पानी, हरा चारा और मिनरल मिश्रण देने की सलाह दी गई है। नवजात बछड़ों को जन्म के दो घंटे के भीतर खीस पिलाना अत्यंत आवश्यक बताया गया है। इसी तरह, मुर्गीपालकों को रानीखेत रोग से बचाव के लिए निर्धारित समय पर वैक्सीन लगाने को कहा गया है, ताकि खरीफ सीजन में होने वाले संभावित जोखिमों से पशुधन की रक्षा की जा सके।