जहां था डर का साया वहां अब रोजगार की राह गोगुंडा में पहली बार तेंदूपत्ता संग्रहण

सुकमा, 28 अप्रैल 2026/sns/-जिले के दुर्गम वनांचल में स्थित गोगुंडा की पहाड़ियां, जो कभी नक्सल प्रभाव के कारण भय और असुरक्षा का पर्याय मानी जाती थीं, आज एक नई पहचान गढ़ रही हैं। जहां पहले सन्नाटा और डर का माहौल था, वहां अब आदिवासी संग्राहकों की चहल-पहल और मेहनत की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। यह बदलाव न सिर्फ एक कार्य की शुरुआत है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए उम्मीद और आत्मविश्वास का संदेश बन गया है।
कलेक्टर श्री अमित कुमार के निर्देशन और डीएफओ श्री अक्षय भोंसले के मार्गदर्शन में वन विभाग ने यहां पहली बार संगठित रूप से तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य प्रारंभ किया है। प्रभारी मंत्री एवं वन मंत्री छत्तीसगढ़ शासन श्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में दो नए फड़कृगोगुंडा फड़ और मिचिगुड़ा फड़कृशुरू किए गए हैं। यह पहली बार है जब यहां के ग्रामीणों को वनोपज संग्रहण के लिए व्यवस्थित व्यवस्था और सरकारी समर्थन मिला है।
वन विभाग को उम्मीद है कि इस सीजन में इन दोनों फड़ों से 200 से अधिक मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहित किया जाएगा। इससे स्थानीय आदिवासी परिवारों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलेगा और उनकी आय में बढ़ोतरी होगी। लंबे समय से संघर्ष और अभाव झेल रहे ग्रामीणों के लिए यह रोजगार का अवसर किसी नई रोशनी से कम नहीं है, जो उनके जीवन में स्थायित्व और सम्मान लेकर आएगा।
यह परिवर्तन सुरक्षा बलों की सतत उपस्थिति और उनके द्वारा बनाए गए सुरक्षित वातावरण के कारण संभव हो सका है। वर्षों तक नक्सल प्रभाव के कारण यह इलाका विकास योजनाओं से दूर रहा, जिससे ग्रामीणों को उनके जंगल और मेहनत का पूरा लाभ नहीं मिल पाता था। अब सुरक्षा, प्रशासन और वन विभाग के संयुक्त प्रयासों से शासन की योजनाएं अंतिम छोर तक पहुंच रही हैं और ग्रामीणों के भीतर भरोसा मजबूत हो रहा है।
तेंदूपत्ता संग्रहण का यह कार्य सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि विश्वास और विकास की नई शुरुआत है। जिन पहाड़ियों पर कभी बंदूक की आवाजें गूंजती थीं, आज वहां मेहनत करते हाथों की हलचल और बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है। गोगुंडा और मिचिगुड़ा फड़ की शुरुआत इस बात का प्रतीक है कि जब सुरक्षा, शासन और जनभागीदारी साथ चलें, तो नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी आत्मनिर्भरता और समृद्धि की राह पर तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।

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