किसानों के खेतों तक पहुंचे कृषि वैज्ञानिक
बीजापुर, 13 अक्टूबर 2026/sns/- जिले के किसानों को फसलों में लगने वाले कीट एवं रोगों से बचाने तथा कम लागत में बेहतर उत्पादन के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र बीजापुर द्वारा 01 से 07 अक्टूबर 2026 तक पौध संरक्षण सप्ताह का आयोजन किया गया। इस दौरान कृषि वैज्ञानिकों की टीम ने जिले के दूरस्थ वनांचल गांवों में पहुंचकर किसानों के खेतों का निरीक्षण किया और चौपाल लगाकर फसलों की सुरक्षा के आसान एवं वैज्ञानिक उपाय बताए। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल एवं निदेशक विस्तार सेवाएं डॉ. एस.एस. टुटेजा के निर्देशानुसार तथा कृषि विज्ञान केन्द्र बीजापुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख श्री अरुण सकनी के मार्गदर्शन में यह अभियान चलाया गया।
अभियान के दौरान कृषि वैज्ञानिक डॉ. शमशेर आलम, विषय वस्तु विशेषज्ञ पादप रोग विज्ञान, डॉ. राजकमल पटेल, सस्य विज्ञान तथा डॉ. अरविन्द आयाम, कीट विज्ञान की टीम ने पनारापारा, कोतापाल, संकनपल्ली, रेड्डी, इटपाल, नैमेड और जांगला सहित विभिन्न गांवों का भ्रमण कर किसानों को फसल संरक्षण की जानकारी दी।
धान और सब्जियों में लगने वाले कीट-रोगों की दी जानकारी- वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि धान की बालियां निकलने के समय फसलों में कई प्रकार के कीट एवं रोग लगने की संभावना रहती है। इनमें जीवाणु जनित झुलसा, भूरा धब्बा, झुलसा रोग, तना छेदक, भूरा माहू और शीथ ब्लाइट प्रमुख हैं। इसके अलावा पोटाश की कमी के लक्षण तथा सब्जियों में लगने वाले रस चूसक कीटों की पहचान और बचाव के उपाय भी बताए गए। वैज्ञानिकों ने किसानों को समझाया कि फसल में बीमारी या कीट का प्रकोप दिखाई देने पर बिना जानकारी के कीटनाशकों का छिड़काव नहीं करना चाहिए। पहले समस्या की सही पहचान कर उसके अनुसार उपचार करना जरूरी है। इससे फसल सुरक्षित रहती है और अनावश्यक खर्च से भी बचा जा सकता है।
नीमास्त्र और जैविक अर्क से कम खर्च में फसलों की सुरक्षा- प्रशिक्षण के दौरान किसानों को नीमास्त्र, दशपर्णी अर्क और ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक उपायों के उपयोग की जानकारी दी गई। साथ ही फेरोमोन ट्रैप और पीले चिपचिपे ट्रैप के माध्यम से हानिकारक कीटों की निगरानी एवं नियंत्रण की विधि समझाई गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन उपायों से रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम की जा सकती है। गंभीर प्रकोप की स्थिति में आवश्यकता के अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में सुरक्षित छिड़काव करने की सलाह भी दी गई।
किसानों को मिला लाभ, प्रति एकड़ 2,500 रुपये तक की बचत- अभियान के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। ग्राम रेड्डी और कोतापाल के किसानों ने फेरोमोन ट्रैप का उपयोग कर हानिकारक कीटों की रोकथाम की। वहीं संकनपल्ली और नैमेड के सब्जी उत्पादकों ने घर पर तैयार जैविक अर्क का उपयोग कर प्रति एकड़ लगभग 2 हजार से 2,500 रुपये तक की लागत बचाई। इसी प्रकार पनारापारा के 15 से अधिक किसानों ने सामूहिक रूप से फसलों की निगरानी शुरू की। इससे अनावश्यक रासायनिक दवाओं के उपयोग और खर्च में कमी आई तथा फसलों की सुरक्षा में मदद मिली।
किसानों ने कहा -अब फसल की बीमारी पहचानकर करेंगे उपचार- ग्राम पापनपाल के प्रगतिशील कृषक श्री पाण्डु ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले धान की पत्तियां पीली पड़ते ही किसान बाजार से महंगी दवाइयां खरीदकर छिड़काव कर देते थे। इससे कई बार खर्च अधिक होता था, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता था। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने फसलों में कीट एवं रोगों के लक्षणों की पहचान करना सिखाया। साथ ही प्राकृतिक अर्क तैयार करने की विधि भी बताई। अब किसान समस्या को समझकर सही उपचार कर सकेंगे, जिससे फसल की सुरक्षा के साथ खेती की लागत भी कम होगी।
वैज्ञानिक खेती से आत्मनिर्भर बन रहे बीजापुर के किसान- कृषि विज्ञान केन्द्र बीजापुर द्वारा आयोजित पौध संरक्षण सप्ताह के माध्यम से किसानों को खेतों में ही व्यावहारिक प्रशिक्षण मिला। इस पहल से किसानों में जैविक उपायों, समन्वित कीट प्रबंधन और कम लागत वाली खेती के प्रति जागरूकता बढ़ी है। कृषि वैज्ञानिकों का यह प्रयास दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने, फसल उत्पादन की लागत कम करने तथा पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।